Tuesday, December 6, 2016

दिव्‍य लोक की खुली है खिड़की 


दिव्‍य लोक की खुली है खिड़की 
बह रही दिव्‍य हवायें 
आइये अपने अन्‍तस को 
दिव्‍यता से सहलायें । 

दिख रहे इस खिड़की से हमको 
दिव्‍यलोक के भव्‍य नजारें
सीधे-साधे आदि गुरूओं के 
सलोने चेहरे प्‍यारे ।

इस खिड़की से ही भेजे जाते 
हमारे मालिक को संदेश 
हमने भी कुछ पढ़ लिये, देखे
'व्हिस्‍पर्स़़...... ' के भेष ।

छोटी सी इस खिड़की के पीछे 
छिपा दिव्‍य खजाना
प्रिय चारीजी ने ढंग से 
सर्वप्रथम इसे पहचाना।

राम नाम की लूट मची है
इस खिड़की से लूट लो
शर्त यह है कि प्रिय मालिक से पहले 
सम्‍बंध अखण्‍ड अटूूट हो। 

सच्‍चा साधक ही कर पायेगा 
इस खिड़की का सदुपयोग 
समर्पित अभ्‍यासी ही कर पायेगा
उस अनंंत से योग।

                                            - ओम गोम्‍बर 

Tuesday, September 13, 2016

दिव्‍य लोक पर चढा़ई


समुद्र सी गहराई, हिमालय सी ऊॅंचाई  
आज मैंने कर दी, दिव्‍य लोक पर चढा़ई।

प्रेम-पर्वतों के घेरे में, हरीतिमा का नृत्‍य है
सतखोल के इस आश्रम में, प्रेम ही सत्‍य है।

प्रेम-मेघ कर रहे, हर पल शांति की वर्षा
असलियत की इस शांति के लिए, मैं कब से था तरसा।

मौन के परिवेश का यहां, साम्राज्‍य हर पल
मेरे हृदय में बह रही, प्रेम-नदी कल-कल।

शीतल पवन के झोंके, रोम-रोम थपकाएं
पक्षियों का मधुर कलरव, नव-गीत सुनाएं।

अभी तो काले बादल थे, तान लिया था मैंने छाता
दो पल में ही देखो यहां, सूरज ने खोल लिया खाता।

पुष्‍प–सुरभि के बोल फूट रहे, पेड़-पौधे लिख रहे ऋचायें
मालिक कैसे-कैसे संकेत कर हमें, अपने पास बुलायें।

आश्रम में आज आये हैं, पचासेक बहन-भाई
दिव्‍य लोक मे ठहराव की, बहुत अच्‍छी किस्‍मत पायी ।

कर बंद ज्ञान किताबों में, प्रकृति ने भण्‍डार खोल दिया
प्रकृति ने खुले हाथों से यहां, प्रेम-ज्ञान बेमोल दिया।

प्रेम-रस में डूबा मेरा हृदय, मालिक का लोहा मान गया
सतखोल आश्रम आना क्‍यों‍ ज़रूरी, यह कारण भी मैं जान गया ।

आंतरिकीकरण करने की अवस्‍था, यहीं बनाई जा सकती है
मालिक की प्रेम-पूर्ण छवि यहीं, हृदय में बिठाई जा सकती है।

समुद्र सी गहराई, हिमालय सी ऊॅंचाई  
आज मैंने कर दी, दिव्‍य लोक पर चढ़ाई।

                                    - ओम गोम्‍बर 

Saturday, August 27, 2016

     मालिक हमको देख रहे


मालिक हमको देख रहे, मालिक की हम पर दृष्टि 
मालिक हमको देख रहे, बरसा रहे कृपा-वृष्टि।

मालिक हम पर मुस्‍करा रहे, प्रेम-पुष्‍प बरसा रहे
रख बांसुरी अपनेे अधरों पर, एक नई धुन बजा रहे।

सुनलो प्रेम-संगीत अनवरत, चहुंओर  फिजाओं में
प्रेम के बोल गुन लो अनवरत, घर-बाहर हवाओं में।

मालिक हमको देख रहे, देकर दिव्‍य-सृष्टि
कर रहे दिव्‍य लोक से, बाबूजी इसकी पुष्टि।

प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे, मालिक बहुत हरषा रहे
प्रतिभागी भाई-बहनों के, गहन अन्‍तस पर छा रहे।

मालिक हमको देख रहे, मालिक की हम पर दृष्टि 
आज मालिक बहुत खुश हैं, दोस्‍तोंं, देख हमारी प्रगति।

नियमित सबकुछ, हर कोई अनुशासित, हृदय पर काम चल रहा
चल कर मालिक के पद चिन्‍हों पर, हम सबका काम बन रहा।

हो गये प्रफ्फुलित हृदय हमारे, हमको भी मालिक दिखने लगे
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में सचमुच, बन्‍द द्वार खुलने लगे।

मालिक हमको देखते ही रहें, बनाये रखनी है यह अवस्था 
हम देते रहेंं मालिक को सहयोग, कर लेनी है यह व्‍यवस्‍था।

बांंध ले मालिक को स्‍वयं से, छोड़ें ना कभी उनका हम साथ 
मालिक ही मंजिल, मालिक ही लक्ष्‍य, सतत् स्‍मरण में रहे यह बात। 

(ग्राउंड-इन-प्रैक्टिस ट्रेेनिंग में भाग लेने पर हुए अनुभव का वर्णन)

                                                                           - ओम गोम्‍बर 

Friday, August 19, 2016

बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे ...


बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे 
ऐसे मालिक मिले
जब-जब भी उन्‍हें करता हूं याद 
लगता है महसूस कि 
सैकडोंं  रजनीगंधा, गुलाब 
                                      खिले ।

भीषण गर्मी में भी लगता है
पैड., पौधे, घास 
हरे-भरे भीगे
                                    गीले।

भंयकर सर्दी में उनके पास 
हर कोई 
दिल की गरमाई का 
सोमरस                       
                                     पी ले।

हालांकि हैंं बहुत हमारे अन्‍दर 
जन्‍मों-जन्‍मों के 
संस्‍कारों - विकारों के 
                                      टीले।

तो भी क्‍या हुअा
मेरे हृदय की सफाई के लिए 
बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे 
ऐसे मालिक मिले ।

सत्‍संगो में यहांं 
भाईचारे की बयार बहे
बजे मौन का संगीत यहां 
मिलेंं अभ्‍यासी आपस में 
नहीं  कोई 
                         शिकवे गिले।

भण्‍डारों में तो मालिक की कृपा का 
हो महसूस 
अनवरत प्रवाह 
एक मण्‍डप के 
                                 तले। 

लगे यह प्रसाद मानो 
मधुमय- मिश्री  के 
                               दिव्‍य डले।


बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे 
ऐसे मालिक मिले ।

मौन में ही हो जाता घटित बहुत-कुछ
कराते उच्‍चतम चेतना से साक्षात्‍कार मालिक 
ध्‍यान में बिना 
                                   हिले-डुले।

चढने लगता जब रंग नियमित अभ्‍यास का 
आंतरिक परिवर्तन की लहरेंं 
हलके से 
हृदय को 
                                     छू  लें ।

बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे 
ऐसे मालिक मिले ।


परमानन्‍द का अर्थ तब समझ में आता
जब हमारे तुच्‍छ प्रयासों से कोई अपना प्रियजन
मालिक से जुड पाता
और तब देखो कैसे हमारा 
                                  अन्‍तस धुले।

बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे 
ऐसे मालिक मिले । 

                                                - ओम गोम्‍बर