Saturday, August 27, 2016

     मालिक हमको देख रहे


मालिक हमको देख रहे, मालिक की हम पर दृष्टि 
मालिक हमको देख रहे, बरसा रहे कृपा-वृष्टि।

मालिक हम पर मुस्‍करा रहे, प्रेम-पुष्‍प बरसा रहे
रख बांसुरी अपनेे अधरों पर, एक नई धुन बजा रहे।

सुनलो प्रेम-संगीत अनवरत, चहुंओर  फिजाओं में
प्रेम के बोल गुन लो अनवरत, घर-बाहर हवाओं में।

मालिक हमको देख रहे, देकर दिव्‍य-सृष्टि
कर रहे दिव्‍य लोक से, बाबूजी इसकी पुष्टि।

प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे, मालिक बहुत हरषा रहे
प्रतिभागी भाई-बहनों के, गहन अन्‍तस पर छा रहे।

मालिक हमको देख रहे, मालिक की हम पर दृष्टि 
आज मालिक बहुत खुश हैं, दोस्‍तोंं, देख हमारी प्रगति।

नियमित सबकुछ, हर कोई अनुशासित, हृदय पर काम चल रहा
चल कर मालिक के पद चिन्‍हों पर, हम सबका काम बन रहा।

हो गये प्रफ्फुलित हृदय हमारे, हमको भी मालिक दिखने लगे
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में सचमुच, बन्‍द द्वार खुलने लगे।

मालिक हमको देखते ही रहें, बनाये रखनी है यह अवस्था 
हम देते रहेंं मालिक को सहयोग, कर लेनी है यह व्‍यवस्‍था।

बांंध ले मालिक को स्‍वयं से, छोड़ें ना कभी उनका हम साथ 
मालिक ही मंजिल, मालिक ही लक्ष्‍य, सतत् स्‍मरण में रहे यह बात। 

(ग्राउंड-इन-प्रैक्टिस ट्रेेनिंग में भाग लेने पर हुए अनुभव का वर्णन)

                                                                           - ओम गोम्‍बर 

Friday, August 19, 2016

बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे ...


बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे 
ऐसे मालिक मिले
जब-जब भी उन्‍हें करता हूं याद 
लगता है महसूस कि 
सैकडोंं  रजनीगंधा, गुलाब 
                                      खिले ।

भीषण गर्मी में भी लगता है
पैड., पौधे, घास 
हरे-भरे भीगे
                                    गीले।

भंयकर सर्दी में उनके पास 
हर कोई 
दिल की गरमाई का 
सोमरस                       
                                     पी ले।

हालांकि हैंं बहुत हमारे अन्‍दर 
जन्‍मों-जन्‍मों के 
संस्‍कारों - विकारों के 
                                      टीले।

तो भी क्‍या हुअा
मेरे हृदय की सफाई के लिए 
बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे 
ऐसे मालिक मिले ।

सत्‍संगो में यहांं 
भाईचारे की बयार बहे
बजे मौन का संगीत यहां 
मिलेंं अभ्‍यासी आपस में 
नहीं  कोई 
                         शिकवे गिले।

भण्‍डारों में तो मालिक की कृपा का 
हो महसूस 
अनवरत प्रवाह 
एक मण्‍डप के 
                                 तले। 

लगे यह प्रसाद मानो 
मधुमय- मिश्री  के 
                               दिव्‍य डले।


बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे 
ऐसे मालिक मिले ।

मौन में ही हो जाता घटित बहुत-कुछ
कराते उच्‍चतम चेतना से साक्षात्‍कार मालिक 
ध्‍यान में बिना 
                                   हिले-डुले।

चढने लगता जब रंग नियमित अभ्‍यास का 
आंतरिक परिवर्तन की लहरेंं 
हलके से 
हृदय को 
                                     छू  लें ।

बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे 
ऐसे मालिक मिले ।


परमानन्‍द का अर्थ तब समझ में आता
जब हमारे तुच्‍छ प्रयासों से कोई अपना प्रियजन
मालिक से जुड पाता
और तब देखो कैसे हमारा 
                                  अन्‍तस धुले।

बहुत खुशकिस्‍मत हूं कि मुझे 
ऐसे मालिक मिले । 

                                                - ओम गोम्‍बर