बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे ...
बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे
ऐसे मालिक मिले
जब-जब भी उन्हें करता हूं याद
लगता है महसूस कि
सैकडोंं रजनीगंधा, गुलाब
खिले ।
भीषण गर्मी में भी लगता है
पैड., पौधे, घास
हरे-भरे भीगे
गीले।
भंयकर सर्दी में उनके पास
हर कोई
दिल की गरमाई का
सोमरस
पी ले।
हालांकि हैंं बहुत हमारे अन्दर
जन्मों-जन्मों के
संस्कारों - विकारों के
टीले।
तो भी क्या हुअा
मेरे हृदय की सफाई के लिए
बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे
ऐसे मालिक मिले ।
सत्संगो में यहांं
भाईचारे की बयार बहे
बजे मौन का संगीत यहां
मिलेंं अभ्यासी आपस में
नहीं कोई
शिकवे गिले।
भण्डारों में तो मालिक की कृपा का
हो महसूस
अनवरत प्रवाह
एक मण्डप के
तले।
लगे यह प्रसाद मानो
मधुमय- मिश्री के
दिव्य डले।
बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे
ऐसे मालिक मिले ।
मौन में ही हो जाता घटित बहुत-कुछ
कराते उच्चतम चेतना से साक्षात्कार मालिक
ध्यान में बिना
हिले-डुले।
चढने लगता जब रंग नियमित अभ्यास का
आंतरिक परिवर्तन की लहरेंं
हलके से
हृदय को
छू लें ।
बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे
ऐसे मालिक मिले ।
परमानन्द का अर्थ तब समझ में आता
जब हमारे तुच्छ प्रयासों से कोई अपना प्रियजन
मालिक से जुड पाता
और तब देखो कैसे हमारा
अन्तस धुले।
बहुत खुशकिस्मत हूं कि मुझे
ऐसे मालिक मिले ।
बहुत अच्छी रचना ..........
ReplyDeleteMalik ki kripa sb per barse..lovly poem
ReplyDeleteMalik ki kripa sb per barse..lovly poem
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