मालिक हमको देख रहे
मालिक हमको देख रहे, मालिक की हम पर दृष्टि
मालिक हमको देख रहे, बरसा रहे कृपा-वृष्टि।
मालिक हम पर मुस्करा रहे, प्रेम-पुष्प बरसा रहे
रख बांसुरी अपनेे अधरों पर, एक नई धुन बजा रहे।
सुनलो प्रेम-संगीत अनवरत, चहुंओर फिजाओं में
प्रेम के बोल गुन लो अनवरत, घर-बाहर हवाओं में।
मालिक हमको देख रहे, देकर दिव्य-सृष्टि
कर रहे दिव्य लोक से, बाबूजी इसकी पुष्टि।
प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे, मालिक बहुत हरषा रहे
प्रतिभागी भाई-बहनों के, गहन अन्तस पर छा रहे।
मालिक हमको देख रहे, मालिक की हम पर दृष्टि
आज मालिक बहुत खुश हैं, दोस्तोंं, देख हमारी प्रगति।
नियमित सबकुछ, हर कोई अनुशासित, हृदय पर काम चल रहा
चल कर मालिक के पद चिन्हों पर, हम सबका काम बन रहा।
हो गये प्रफ्फुलित हृदय हमारे, हमको भी मालिक दिखने लगे
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में सचमुच, बन्द द्वार खुलने लगे।
मालिक हमको देखते ही रहें, बनाये रखनी है यह अवस्था
हम देते रहेंं मालिक को सहयोग, कर लेनी है यह व्यवस्था।
बांंध ले मालिक को स्वयं से, छोड़ें ना कभी उनका हम साथ
मालिक ही मंजिल, मालिक ही लक्ष्य, सतत् स्मरण में रहे यह बात।
(ग्राउंड-इन-प्रैक्टिस ट्रेेनिंग में भाग लेने पर हुए अनुभव का वर्णन)
- ओम गोम्बर
17 January, 2016 को मैं जोधपुर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल हुआ था। इस कविता से मुझे उन क्षणों की याद आ गई ।
ReplyDeleteMalik ka divay prakash sbpe barse.. this poem is realy nice..
ReplyDeleteMalik ka divay prakash sbpe barse.. this poem is realy nice..
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