Tuesday, September 13, 2016

दिव्‍य लोक पर चढा़ई


समुद्र सी गहराई, हिमालय सी ऊॅंचाई  
आज मैंने कर दी, दिव्‍य लोक पर चढा़ई।

प्रेम-पर्वतों के घेरे में, हरीतिमा का नृत्‍य है
सतखोल के इस आश्रम में, प्रेम ही सत्‍य है।

प्रेम-मेघ कर रहे, हर पल शांति की वर्षा
असलियत की इस शांति के लिए, मैं कब से था तरसा।

मौन के परिवेश का यहां, साम्राज्‍य हर पल
मेरे हृदय में बह रही, प्रेम-नदी कल-कल।

शीतल पवन के झोंके, रोम-रोम थपकाएं
पक्षियों का मधुर कलरव, नव-गीत सुनाएं।

अभी तो काले बादल थे, तान लिया था मैंने छाता
दो पल में ही देखो यहां, सूरज ने खोल लिया खाता।

पुष्‍प–सुरभि के बोल फूट रहे, पेड़-पौधे लिख रहे ऋचायें
मालिक कैसे-कैसे संकेत कर हमें, अपने पास बुलायें।

आश्रम में आज आये हैं, पचासेक बहन-भाई
दिव्‍य लोक मे ठहराव की, बहुत अच्‍छी किस्‍मत पायी ।

कर बंद ज्ञान किताबों में, प्रकृति ने भण्‍डार खोल दिया
प्रकृति ने खुले हाथों से यहां, प्रेम-ज्ञान बेमोल दिया।

प्रेम-रस में डूबा मेरा हृदय, मालिक का लोहा मान गया
सतखोल आश्रम आना क्‍यों‍ ज़रूरी, यह कारण भी मैं जान गया ।

आंतरिकीकरण करने की अवस्‍था, यहीं बनाई जा सकती है
मालिक की प्रेम-पूर्ण छवि यहीं, हृदय में बिठाई जा सकती है।

समुद्र सी गहराई, हिमालय सी ऊॅंचाई  
आज मैंने कर दी, दिव्‍य लोक पर चढ़ाई।

                                    - ओम गोम्‍बर 

6 comments:

  1. कविता चित्रात्‍मक लगी। हृदय को छू लेने वाली कविता है।

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  3. कविता दिल को छू गई। मै भी सतखोल के वातावरण का स्वाद लेना चाहता हू।

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